शिव पुराण (SHIV PURAN)

                             


    हिन्दू संस्कृति में भगवान शिव का एक अलग ही स्थान है।  भगवान शिव की आराधना सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में किसी न किसी रूप में  की जाती है। भगवान शिव को इस सृष्टि का पालनकर्ता, रचियता और  संहारक माना  जाता है। उनकी इच्छा से ही इस सृष्टी पर कार्य होता है यहाँ तक की विनाश भी उनकी मर्जी से होता है।  
     'शिव पुराण ' भगवान शिव की लीला , माहात्म्य और कल्याणकारी स्वरुप का विस्तृत वर्णन किया गया है। 

 
पहला अध्याय  


श्री शौनक जी द्वारा  श्री सूत जी को  शिव पुराण के बारे में पूछे जाने पर श्री सूत जी का शिव पुराण  महिमा का वर्णन 

श्री शौनक जी ने पूछा  - हे , परम ज्ञानी श्री सूत जी कृपा करके मुझे बताये की मनुष्य भक्ति के मार्ग से  अपने विवेक की वृद्धि कैसे करें , किस तरह काम , क्रोध और लालच  पर विजय पा  सके। आज के  इस दौर में मनुष्य  का स्वभाव  विचित्र हो गया है।  ऐसा मार्ग बताये जो सम्पूर्ण मनुष्य जाती के  लिए कल्याणकारी हो और उसका उपयोग कर हर मनुष्य की आत्मा का शुद्धि करन हो और वे जब शुद्ध हो  जाये तो  उस निर्मल ह्रदय वाले  व्यक्ती को  प्रभु की प्राप्ति हो जाये।
    श्री सूत जी ने  कहा :- शौनक जी  आपके मन में शिव पुराण कथा सुनने की प्रबल  इच्छा और  प्रेम है। इसलिए में आपको  महान ' शिव पुराण ' कथा सुनाता हूँ / भक्ति को बढाने वाला , शिव को प्रसन्न करेने वाला  महान  शास्त्र है  "शिव पुराण"।  इसका पूर्वकाल में शिव जी ने ही प्रवचन किया था। महर्षि व्यास ने सनत्कुमार मुनि का  आदेश पाकर ही  आदरपूर्वक शिव पुराण की रचना की थी।  इस पुराण का नित्य वाचन या श्रवन  करना कलयुग के  प्रत्येक व्यक्ति के लिए हितकारक है।  

    इस संसार के प्रत्येक व्यक्ति को शिव पुराण का  वाचन या श्रवण करना चाहिए , यह कथा  मनुष्य को  मनवांछित फल देनेवाली कथा है।  इससे मनुष्य पाप मुक्त  हो जाता है  तथा  इस लोक के सारे सुखों को भोगकर अंत में शिवलोक को प्राप्त हो जाता है।  
    शिव पुराण में सात संहिताय है जिसमे 24 हजार श्लोक है।  शिव पूरान परमात्मा की तरह गति प्रदान करने वाला है। प्रत्येक मनुष्य को  शिव पुराण पूर्ण भक्ति के साथ  सुनना चाहिए।  जो मनुष्य नित्य रूप से शिव पुराण का पठन करता है या संयमपूर्वक इसको सुनाता है वह पुण्य आत्मा बन जाता है। भगवन शिव की कृपा उनपर सदा बनी रहती है  वे सदा सुखी रहते है। भगवन शिव उस व्यक्ति पर प्रसन्न होकर उसे शिव धाम प्रधान करते है /
शिव पुराण में भगवन शिव का सर्वस्व है।  इसलिए मोक्ष प्राप्ति के लिए शिव पुराण का सेवन श्रद्धा से करना चाहिए। 



                                                                                                                                                                                                     

दूसरा अध्याय 


देवराज ब्राह्मण को शिवलोक की प्राप्ती 

    देवराज ब्राह्मण को शिवलोक की प्राप्ति चंचुला का संसार से वैराग्य 

    श्री शौनक जी ने पहला अध्याय सुनकर कहा— धन्य हो सुत जी! आप परमार्थ तत्व के ज्ञाता हो। आपने हम पर कृपा करके हमे यह अद्भुत और दिव्य कथा सनाई है। भुतल पर इस कथा के समान कल्याण कारी और कोई कथा नहीं है। आपकी कृपा से यह बात हमने समझ ली है। सुत जी! इस कथा से कौनसे पापी दुराचारी जीव शुद्ध होते हैं? उन्हें कृपापुर्वक बताकर इस जगत को कृतार्थ किजिए। सुत ने शौनक जी की बात सुनकर कहा — जो मनुष्य पाप, दुराचार तथा काम- क्रोध, मद, लोभ में निरंतर डूब रहते हैं, वे सभी शिव पुराण कथा पढ़ने अथवा सुनने से शुद्ध हो जाते हैं तथा उनके पाप का पुर्णतया नाश हो जाता है। इस विषय में मैं आपको एक और कथा सनाता 
हुं । 

    देवराज ब्राह्मण की कथा 

    बहुत पहले की बात है,  किरात के नगर में एक देवराज नाम का ब्राह्मण रहता था। वह ज्ञान में दुर्बल, गरीब, तथा वैदिक धर्म से विमुख था। वह स्नान-संध्या नहीं करता था। तथा उसमें वैश्य - वृत्ति बढ़ती ही जा रही थी। वह भक्तों को ठगता था। उसने अनेक मनुष्यों को मारकर उन सबका धन हड़प लिया था। उस पापी ने थोड़ा-सा भी धन धर्म -कर्म के काम में नहीं लगाया था। वह दुराचारी था। एक दिन वह घुमता हुआ दैवयोग से प्रतिष्ठानपुर जा पहुंचा। वहा उसने एक शिवालय देखा, जहा बहुत से साधु-महात्मा एकत्रित हुए थे। देवराज वही ठहर गया। वहा रात में उसे बुखार आया और उसे बुखार के कारण बड़ी पीड़ा होने लगी। वहीं पर एक ब्राह्मण देवता शिव पुराण की कथा सना रहें थे। बुखार से पीड़ित देवराज भी शिव पुराण कथा ब्राह्मण के मुख से निरंतर सुनता रहता था। एक मास बाद देवराज उसी पीड़त अवस्था में चल बसा। यमराज के दुत उसे बांधकर यमपुरी ले गए। तभी वहा शिवलोक से भगवान शिव के पार्षदगण आ गए। वे सभी कर्पूर के समान उज्वल थें। उनके हाथ में त्रिशूल, संपुर्ण शरीर पर भस्म लगा हुआ था और गले में रुद्राक्ष की माला थी जो उनके शरीर की शोभा बढ़ा रही थी। उन्होंने यमराज के दुतो को भगवान शिव का आदेश सुना कर देवराज को लेकर जाने की अनुमति मांगी लेकिन यमदुतो ने नहीं माना जिस कारण वे आपस में उलझ पडे जिसके कारण यमराज को सुचित किया गया और तुरंत यमराज ने अपने कक्ष से बाहर आकर सारा मामला समझ लिया उसके बाद यमराज ने स्वंय शिव दुतो की पुजार्चना कर देवराज को उनके सुपुर्द किया उन्होंने भय के कारण भगवान शिव के दुतों से कोई बात नहीं पुछी। उसके बाद शिवदुत देवराज को लेकर कैलाश चले गए ।
और वहा पहुंचकर उन्होंने ब्राह्मण को कणावतार भगवान शिव के हाथों में सौंप दिया। 
    कथा सुनकर शौनक जी ने कहा—महात्मा सुत जी! आप सवज्ञाता है। आपकी कृपा से  मैं धन्य हो गया। इस कथा को सुनकर मेरा मन आनंदित हो गया है। अतः भगवान शिव में प्रेम भक्ति बढ़ाने वाली सारी दुसरी कथाएं भी सुनाईए।


 तीसरा अध्याय 
 

बिंदुग ब्राह्मण की कथा और चंचुला का संसार से वैराग्य
 

    सुत जी बोले—शौनक जी  सुनो, में आपकों एक ओर गोपनीय कथा सुनाता हुं क्योंकि तुम शिवभक्तों में सबसे आगे हो और वेदवेत्ताओं में सबसे श्रेष्ठ हो। समुद्र के निकटवर्ती प्रदेश में वाष्कल नामक गाव है, जहा वैदिक धर्म से विमुख महापापी मनुष्य रहते है। ओ सभी अधर्मी है और उनका मन हमेशा दुषित विषय, लोभ भोगों में लगा रहता है। वे मनुष्य देवता एवं भाग्य पर विश्वास नहीं करते। वे सभी कुटिल व पापी वृत्ति वाले हैं। वे सभी किसानी करते हैं और वे सभी प्रकार के अस्त्र शस्त्र रखते हैं। वे व्यभिचारी हैं। वे इस बात से पृणतः अनजान हैं कि ज्ञान वैराग्य तथा सदधर्म ही मनुष्य प्राणी के लिए परम पुरुषार्थ है। वे सभी पशु बुद्धि है। अन्य समुदाय के लोग भी उन्ही की तरह बुरे विचार रखने वाले, धर्म से विमुख है।  हमेशा नये नये कुकर्म में लगे रहते हैं एवं सदा विषयभोग में डुबे रहते हैं। वहा की स्रीयां भी बुर स्वभाव की, स्वेच्छाचारिणी, पाप में डुबी हुई, कुटिल सोच रखने वाली और व्यभिचारिणी हैं। वे सभी सद्व्यवहार तथा सदाचार से शुन्य है। वहा सिर्फ पापी, अधर्मी एवं दुष्टों का निवास है। 
    वाष्कल नामक गाव में बिंदुग नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह अधर्मी, दुष्ट आत्मा का स्वामी दुरात्मा एवं महापापी था। उसकी पत्नी बहुत सुंदर थी। उसका नाम चंचुला था। वह सदा उसके धर्म का पालन उत्तम प्रकार से करती थी परंतु बिंदुग वैश गामी था। इस तरह के कुकर्म करते काफी समय बीत गया था। उसकी स्री काम पीड़त होन पर भी स्वधर्म नाश के भय से पीडा सहकर भी काफ समय तक उसने पतिव्रता धर्म भ्रष्ट  नहीं होने दिया। परंतु आगे चलकर वह भी अपने दुराचारी पति की संगत से प्रभावित होकर, दुराचारणी और अपने धर्म से विमुख हो गई। 
    इस तरह दुराचार में डुबे हुए उन पति-पत्नी का बहुत सा समय व्यर्थ बीत गया। वैशागामी, दुष्ट पापी प्रवृत्ति वाला वह  ब्राह्मण बिंदुग समय से मृत्यु को प्राप्त हो गया, नरक में चला गया। बहुत दिन तक नरक के दुःखों को भोगकर वह मढ़ बुद्धि, पापी विंध्य पर्वत पर भयंकर पिशाच बन गया। इधर, उस दुराचारी बिंदुग ब्राह्मण के मर जाने के बाद उसकी पत्नी बहुत समय तक अपने बच्चों के साथ रहने लगी।पति के मौत के बाद चंचुला भी अपने धर्म से विमुख होने लगी और पर पुरुषों का संंग करने लगी। सतिया विपरीत परिस्थितियों में भी अपने धर्म का पालन करना नहीं छोड़ती है। यही तो तप है। तप कठिन तो होता है, लेकिन इसका फल मीठा होता है। मनुष्य इस सत्य को नहीं जानता इसीलए वह विषय के विषफल का स्वाद लेते जिवन भोग करता है। एक दिन देवयोग से किसी पुण्य पर्व के आने पर वह अपन भाईयों के साथ गोकर्ण क्षेत्र में गई। उसने तीर्थ के जल में स्नान किया एवं बंधुजन के साथ यहा-तहा घुमने लगी। घुमते-घुमते वह एक शिव मंदिर में गई वहां उसने एक ब्राह्मण को शिव पुराण कथा सुनाते देखा। चंचुला वहीं मंदिर में परम पुण्य, मंगलकारी शिव पुराण कथा सुनी । ब्राह्मण कह रहे थे की जो स्रीया व्यभिचार करती है ओ मरणोपरांत यम लोक जाती है तब यमराज के दुत उन्हें तरह तरह की सजाएं देते हैं उनके काम अंगों को गरम लोह दंडो से दागते है तप्त लोह पुरुष से उनका संसर्ग कराते हैं । यह सारे दंड इतने कष्टदायक होते हैं की व्यभिचारी जीव पुकार पुकार कहता है कि बस अब ओ ऐसा नहीं करेगा । लेकिन यमदुत उसे छोड़ते नहीं है।कर्म का फल सबको भोगना पड़ता है। देव-दानव, मनुष्य, ऋषि सब इससे बंधे हुए हैं। ब्राह्मण के मुख से यह कथा सुनकर चंचुला भय से व्याकुल हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब ओ क्या करें अंततः उसने ब्राह्मण से कहा हे ब्राह्मण देवता धर्म को न जानने के कारण मेरे व्दारा बहुत बड़ा व्यभिचार, दुराचार हुआ है। हे ब्राह्मण देवता मेरे उपर कृपा करे और मेरा उद्धार करें। आप के मुख से कथा सुनकर मुझे संसार से वैराग्य हो गया है धिक्कार है मुझ जैसी कुलक्षिणी पापिनी का, मैं नींदा के योग्य हुं। बुरे विषयों में फसकर अपने धर्म से विमुख हो गई थी।कोन मुझ जैसी पापिनी का सार देगा जब यमदूत मुझे नरक ले जाएंगे और मेरी आत्मा को अनंत यात्नाए देंगे। तब कैसे में उन यात्नाओं को सहन कर पाउंगी? क्योंकि मैं अभी तक सभी प्रकार के पापों में डुबी रही हूं। हे ब्राह्मण देवता मैं आपकी शरण में आई हुं आप मेरे गुरु आपही मेरे माता - पिता है। मुझ अबला का आप ही उद्धार किजिए। सुत जी शौनक से कहते हैं - शौनक! इस तरह चंचुला विलाप करते हुए ब्राह्मण देवता के कदमों में गिर पडी। तब ब्राह्मण ने उसे कृतज्ञतापूर्वक, कृपा पुर्वक उसे उठाया । 
    चंचुला की शिव पुराण कथा सुनने में रुचि  और शिव लोक गमन

    ब्राह्मण ने चंचुला से कहा - हे माते तुम बडी ही सौभाग्यशाली हो जो तुमने समय से वैराग्यपूर्ण महान शिव पुराण कथा सुन ली और अपनी ग़लती का एहसास कर लिया है। तुम डरो मत, भगवान शिव की शरम में आते ही सबके पाप तुरंत खत्म हो जाते हैं।शिव बड़े दयालु है। शिव कथा के साथ तुम्हे वह मार्ग भी बताऊंगा जिनका पालन करने से तुम्हारे पाप खत्म हो कर तुम्हें सुख भोगों का मार्ग प्राप्त होगा। शिव कथा सुनने से तुम्हारी बुद्धि शुद्ध हुई एवं तुम्हे पश्चाताप हुआ है। मन से पश्चाताप करना ही पापों को खत्म करता है। सत्पुरुषों के अनुसार पापों को खत्म करने के लिए प्रायश्चित से बढ़कर दुनियां में कोई दुसरा उपाय नहीं है। जो मनुष्य हृदय से अपने कुकर्मो का पश्चाताप करता है निश्चित ही वह मनुष्य प्रभु की कृपा का हकदार होता है।
    शिव पुराण कथा सुनने से मन निर्मल हो जाता है। शुद्ध मन में ही भगवान शिव पार्वती का वास होता है। वह शुद्ध आत्मा पुरुष सदाशिव की कृपा को प्राप्त होता है। शिव पुराण कथा को सुनना सभी मनुष्यों के लिए लाभदायक होता है इसलिए इसकी आराधना और सेवा करनी चाहिए। यह कथा सभी रोगो का नाश करने वाली है। भगवान शिव की कथा सुनकर उसका मन में मनन करना चाहिए इससे मन की शुद्धि होती है। मन की शुद्धि से महेश्वर की भक्ति निश्चित प्रकट होती है तथा उनके अनुग्रह से मुक्ति प्राप्त होती है। जो मनुष्य माया के प्रति आसक्त है वह इस संसार रुपी बंधन से मुक्त नहीं हो पाता।
    हे ब्राह्मण पत्नी तुम संसार के सारे विषयों को मन से हटाकर इस पवित्र शिव पुराण कथा को सुनो इससे तुम्हारे मन की शुद्धि होगी और तुम मोक्ष को प्राप्त होंगी। जो मनुष्य निर्मल हृदय से भगवान शिव के चरणों की आराधना करता है उसको एक ही जन्म में मोक्ष मिल जाता है 
    सुत जी शौनक को कहते हैं, शौनक !  इतना कहकर वह ब्राह्मण चुप हो गया और उसका हृदय करुणा से भर गया। वे ध्यान में मग्न हो गए और ब्राह्मण का उपदेश सुनकर चंचुला का मन प्रसन्नता से भर गया और उसके आनंदाश्रु आंखों से झलक पडे। चंचुला अपने प्रसन्न हर्ष से भरे हृदय के साथ ब्राह्मण के चरणों में गिर पडी और उस महान बुध्दिमान ब्राह्मण ने उसे कृपापुर्वक उठाया और इस प्रकार कहा कि हे नारी यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि भगवान शिव की कृपा से शिवपुराण की इस वैराग्ययुक्त कथा को सुनकर तुम्हे समय पर चेत हो गया। मेरे मन मै वैराग्य उत्पन्न हो रहा है।  उस अमृतमयी शिव पुराण कथा को सुनने के लिए ही मेरे मन में बड़ी श्रद्धा हो रही है।  कृपया आप मुझे उसे सुनाइए। 
  
   सूत जी कहते है - शिव पुराण की कथा सुनने की इच्छा मन में लिए हुए चंचुला उन ब्राम्हण देवता की सेवा में वही रहने लगी।  उस गोकर्ण नामक महाक्षेत्र में उन ब्राह्मण देवता के मुख से चंचुला शिव पुराण की भक्ति , ज्ञान और वैराग्य बढ़ाने वाली और मुक्ति देने वाली कथा सुनकर शिव के  सगुन रूप का चिंतन करने लगी। वह सदैव शिव के सच्चिदानंदमय स्वरुप का स्मरण करती थी।  तत्पच्छात , अपना समय पूर्ण होने पर चंचुला ने  बिना किसी कष्ट के अपना शरीर त्याग दिया। उसे लेने के लिए  एक दिव्य  विमान वहां पहुंचा।  यह  विमान शोभा - साधनों से सज्ज था एवं शिव गणों  से  सुशोभित था।  
    
    चंचुला विमान से शिवपुरी धाम पहुंची।  उसके  सारे पाप धूल गए।  वह दिव्यांगना हो गई।  वह गौरांगीदेवी मस्तक पर अर्धचंद्र का मुकुट व् अन्य दिव्य आभूषण पहने शिवपुरी पहुंची।  वहा  उसने  सनातन  देवता त्रिनेत्रधारी महादेव शिव को देखा।  सभी देवता उनकी सेवा में भक्तिभाव से उपस्थित थे। उनकी अंग कांति  करोड़ों सूर्यों के समान  प्रकाशित हो रही थी।  पांच मुख कंठ में नील चिन्ह था।  उनके साथ बैठी गौरी विराजमान थी।  उनके शरीर पर श्वेत वस्त्र थे तथा शरीर श्वेत भष्म से युक्त था।  
    इस प्रकार भगवान  शिव के उज्जवल रूप के दर्शन कर चंचुला इतनी प्रसन्न हो गई की उसने भगवान को पुनः पुनः प्रणाम किया।  और हाथ जोड़कर प्रेम , संतोष  हर्ष उल्लहास के साथ विनीतभाव से खड़ी  हो गई।  उसके नेत्रों से आनंदाश्रु की धारा बहने लगी।  भगवान शिव व माता पार्वती ने करुणा के साथ सौम्य दृष्टी से देखकर चंचुला को अपने पास बुलाया। माँ गौरी उमा ने उसे प्रेमपूर्वक अपनी सखी बना लिया।  ;चंचुला सुखपूर्वक भगवन शिव के धाम में माँ गौरी की सखी बनकर निवास करने लगी। 
  






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